परंपरागत वेशभूषा में बुजुर्गों ने कैटवॉक से बिखेरा जलवा

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भिवानी। पगड़ी और तुर्रा को हरियाणा की आन, बान व शान माना जाता है। पर समय के साथ विलुप्त हो रही इस पगड़ी व तुर्रा के साथ हरियाणवी पहनावे को बताने के लिए भिवानी के युवाओं ने नई पहल की। यहां पगड़ी, धोती व कुर्ता पहने बुजुर्गों व युवाओं की कैटवॉक प्रतियोगिता करवाई गई।

हरियाणा का पहनावा पगड़ी, धोती, कुर्ता व हाथ में डोगा (छड़ी) परंपरागत पहनावा है। पर समय के साथ ये पहनावा कम होता जा रहा है। चंद बुजुर्ग लोगों को ही इस पहनावे में देखा जा सकता है। युवा की बात करें तो शायद ही कोई ऐसा होगा, जिसे पगड़ी व धोती बांधनी भी आती हो। ऐसे में नए साल पर जहां लोग अलग-अलग तरह से जश्न मनाने निकले। वहीं भिवानी में हरियाणवी पहनावे व संस्कृति को बताने की मुहिम के साथ नया साल मनाया गया। जहां बच्चों को भी इसमें शामिल किया। उन्होंने पगड़ी व धोती बांधना सिखाया गया। उनकी बुजुर्गों के साथ पगड़ी, कुर्ते, धोती व डोगे के साथ कैटवॉक प्रतियोगिता करवाई गई। जिसमें हरियाणवी कलाकार (कालु की गलत फैमिली नाटक) अंकित उर्फ बिल्लू सरपंच आकर्षक का केंद्र रहे।

आयोजक हर्षवर्धन मान व रणविजय ग्रेवाल ने कहा कि पगड़ी सिर्फ पहनावा नहीं। ये सत्य, त्याग व न्याय की प्रतीक है। समय के साथ हरियाणवी पहनावा खत्म हो रहा है। जिसे बताने के लिए नए साल पर ये नई पहल की है। उन्होंने कहा कि आज बच्चों को हरियाणवी पहचाने का महत्व बताकर उन्हें पगड़ी व धोती बांधना भी सिखाया गया है। आयोजकों ने कहा कि समय के साथ सब बदल रहा है। पर हमारी परंपरागत वेशभूषा व संस्कृति को बचाने के लिए ये शुरुआत हो, जिसके लिए आगे से हर साल ये आयोजन किया जाएगा। वहीं इस प्रतियोगिता में पहुंचे अंकित उर्फ बिल्लू सरपंच ने कहा कि हरियाणवी पहनाने व संस्कृति को बचाने के अच्छी पहल है। ऐसी पहल से ही हरियाणवी पहनाने को बढ़ावा मिलेगा। साथ ही कहा कि ये हरियाणवी संस्कृति की ड्रेस बनाई जाए और इसे काम्य रखा जाए।