चंडीगढ़। पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट ने जेल सुधारों से जुड़े एक मुद्दे पर सख्त रुख अपनाया है। हाईकोर्ट ने पंजाब और हरियाणा सरकारों को निर्देश दिया है कि वे कैदियों की रिहाई और समयपूर्व रिहाई (रीमिशन/प्रीमेच्योर रिलीज) की पात्रता को लेकर अपनी-अपनी नीतियों का तुलनात्मक चार्ट संयुक्त रूप से तैयार कर अदालत में दाखिल करें।
मुख्य न्यायाधीश शील नागू की अध्यक्षता वाली खंडपीठ ने स्पष्ट कहा कि दोनों राज्यों की नीतियों में अंतर है और जब तक यह साफ नहीं होगा कि कौन-सा मापदंड कहां लागू है, तब तक अदालत निगरानी कैसे करेगी?
मामला उस समय अदालत के सामने आया जब सुप्रीम कोर्ट ने स्वयं संज्ञान लेते हुए देशभर में कैदियों की रिहाई और समयपूर्व रिहाई की प्रक्रियाओं पर निगरानी के निर्देश दिए और सभी हाईकोर्ट से कहा कि वे इस प्रक्रिया को मॉनिटर और सुपरवाइज करें। इसी आदेश के तहत यह याचिका हाईकोर्ट में रखी गई, जहां सुनवाई के दौरान खंडपीठ ने कहा कि अलग-अलग नीतियों के चलते पात्रता को लेकर भ्रम की स्थिति बन रही है।
अदालत ने टिप्पणी की कि चंडीगढ़ प्रशासन पंजाब की नीति का पालन करता है, जबकि हरियाणा एक अलग वैधानिक ढांचे के तहत काम कर रहा है, जिससे पात्रता और मूल्यांकन के मापदंडों में फर्क आ रहा है। न्यायालय ने पूछा कि आखिर कैदियों के लिए रीमिशन का ‘यार्डस्टिक’ कहां और कैसे तय किया गया है, क्योंकि बिना स्पष्ट मापदंड के निष्पक्ष निगरानी संभव नहीं।
सुनवाई के दौरान पंजाब सरकार ने बताया कि वह 14 दिसंबर 2017 की समयपूर्व रिहाई नीति के तहत काम कर रही है, जबकि हरियाणा सरकार ने कहा कि वह हरियाणा जेल नियम, 2022 के अनुसार रिहाई के मामलों पर निर्णय लेती है, जो प्रिजंस एक्ट के प्रविधान के तहत बनाए गए हैं। इन विभिन्न व्यवस्थाओं के कारण पात्रता के मापदंडों में फर्क सामने आया है।
खंडपीठ ने आदेश में कहा कि पंजाब और हरियाणा दोनों राज्य मिलकर एक विस्तृत तुलनात्मक चार्ट तैयार करें, जिसमें उनकी-उनकी नीतियों और नियमों के तहत तय पात्रता शर्तों को स्पष्ट रूप से दर्शाया जाए और उसके साथ हलफनामा दाखिल किया जाए, ताकि अदालत सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों के अनुरूप निगरानी और पर्यवेक्षण कर सके।
अदालत ने इस कार्य के लिए तीन सप्ताह का समय देते हुए स्पष्ट किया कि यह प्रक्रिया केवल औपचारिक नहीं, बल्कि जेलों में भीड़ कम करने, विलंब रोकने और कैदियों के साथ समान और न्यायपूर्ण व्यवहार सुनिश्चित करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है।
सुप्रीम कोर्ट पहले ही यह स्पष्ट कर चुका है कि सभी हाईकोर्ट अपने-अपने राज्यों में स्वयं संज्ञान लेकर इस व्यवस्था की निगरानी करें, ताकि देशभर में रीमिशन और समयपूर्व रिहाई की प्रक्रिया एकरूप, पारदर्शी और समयबद्ध बन सके।






















