यमुनानगर। सड़क हादसे ने जयवीर से उसका दाहिना पैर छीन लिया। इसके साथ ही सेना में भर्ती होने का सपना, दौड़ने की रफ्तार और सामान्य जिंदगी की उम्मीदें भी टूट गईं, लेकिन इसी टूटन से ऐसा हौसला जन्मा, जिसने उसे हार नहीं मानने दी। वर्ष 2013 के हादसे के बाद जयवीर ने महीनों अस्पताल में इलाज कराया। वर्षों तक मानसिक संघर्ष और अवसाद से भी जूझना पड़ा।
इसके बावजूद चरखी दादरी निवासी 30 वर्षीय जयवीर, जो वर्तमान में जगाधरी वर्कशाप के रेल कारखाने में सहायक के रूप में कार्यरत हैं, ने पैरा खेलों को अपना सहारा बनाया। पैरा ताइक्वांडो सहित विभिन्न खेलों में सात पदक जीतकर उन्होंने साबित कर दिया कि शरीर भले टूट जाए, अगर जज्बा जिंदा हो तो सफलता का रास्ता खुद बन जाता है।
जयवीर ने बताया कि वह राज्यस्तरीय धावक रह चुके हैं और 400 मीटर दौड़ में जिलास्तर पर स्वर्ण पदक भी जीत चुके हैं। इसके बाद 2013 में हुए सड़क हादसे के बाद जीवन पूरी तरह बदल गया। गंभीर रूप से घायल होने के कारण उन्हें अपना दाहिना पैर गंवाना पड़ा। इससे भारतीय सेना में चयन का सपना भी टूट गया।
तीन साल तक अवसाद और निराशा से जूझने के बाद उन्होंने पैरा खेलों की ओर रुख किया। पंचकूला के सेक्टर-3 में 27 से 29 दिसंबर तक हुई दूसरी हरियाणा ओपन स्टेट पैरा ताइक्वांडो प्रतियोगिता में स्वर्ण पदक जीतकर सबको चौंका दिया।
जयवीर ने 2018 में भाला फेंक में स्वर्ण, 2019 में रजत, 2022 और 2024 में पैरा फुटबाल में पदक, 2023 में योगासन में स्वर्ण और 2024 में राष्ट्रीय स्तर पर कांस्य हर पदक एक संघर्ष की कहानी कहता है। इस तरह, सड़क हादसे के बाद पैरा खेल जयवीर के लिए सिर्फ प्रतियोगिता नहीं, बल्कि आत्म सम्मान लौटाने का जरिया भी बन गया।
खेल ने उन्हें सिखाया कि शरीर की सीमा तय हो सकती है, लेकिन सपनों की नहीं। आज वे न केवल अपने लिए बल्कि उन सभी लोगों के लिए प्रेरणा हैं, जो किसी न किसी वजह से खुद को कमजोर मान लेते हैं। जयवीर का लक्ष्य पैरा ओलंपिक में देश के लिए पदक जीतना है।

















