उत्तर प्रदेश के अलग-अलग जिलों में कई मंदिर स्थित हैं, जो लोगों की आस्था केंद्र भी हैं. इन मंदिरों में प्रतिदिन हजारों लोग अपनी श्रद्धा अर्पित करते हैं. ऐसा ही एक मंदिर कानपुर में स्थित है, जो भगवान झूलेलाल मंदिर के नाम से प्रसिद्ध है. दावा किया जाता है कि इस मंदिर में रखी अखंड ज्योति बंटवारे के समय पाकिस्तान क सिंध स्थित भगवान झूलेलाल के ठठ्ठा मंदिर से लाई गई थी. मंदिर में रखी अखंड ज्योति 77 सालों से निरंतर प्रज्वलित है.
कानपुर के पी रोड में स्थित भगवान झलेलाल का मंदिर सिंधी समुदाय के लिए बड़ा आस्था का केंद्र है. इस अखंड ज्योति के लिए कहा जाता है कि विभाजन के समय 1947 में पाकिस्तान से ग्वालियर फिर वहां से 1948 में कानपुर पहुंची. इस ज्योति को सिंधी समाज के पाकिस्तान में रह रहे हैं उद्धव दास लेकर आए पहले इस ज्योत को कानपुर के पी रोड स्थित भगवान भोलेनाथ के वन खंडेश्वर मंदिर के पास एक कमरे में रखा गया. कुछ दिन बाद यह ज्योति पी रोड रामबाग के पास एक कुटी बनाकर स्थापित की गई. इसके कुछ समय बाद पी रोड के रामबाग स्थित कुटी पर ही श्री भगवान झूलेलाल मंदिर के निर्माण के बाद यह ज्योत स्थापित कर दी गई.
पाकिस्तान से लाई गई थी अखंड ज्योति
मंदिर निर्माण और ज्योति की स्थापना के बाद से यह मंदिर में लगातार जल रही है. सिंधी समाज के श्रद्धालु इसके दर्शन पूजन को आते हैं. इस ज्योत के दर्शन के लिए सिंधी समुदाय का चालीहा महोत्सव के 40 दिन बीत जाने के बाद अखंड ज्योत के पट खोले जाते हैं. लोगों को दर्शन होते हैं. उद्धव दास के परिवार के लोग का दावा है कि उनके बाबा विभाजन के वक्त पाकिस्तान के सिंध के ठठ्ठा स्थित मंदिर में प्रज्वलित आखंड ज्योत को भारत लेकर कानपुर आए थे. उन्हें डर था कि यहां से पलायन के बाद, इस अखंड ज्योत को कोई नुकसान न पहुंचा दिया जाए.
दर्शन के लिए विदेशों से आते हैं लोग
सिंधी समाज के चालिहा मुख्य धार्मिक आयोजन यहां पर हर वर्ष अगस्त के महीने में शुरू होता है, जो 40 दिन चलता है. युवा एकता सिंधी समाज के अध्यक्ष धर्मेंद्र फतवानी ने बताया कि इस मंदिर में स्थापित ज्योति के दर्शन के लिए चालिहा पर्व के समय कानपुर के आसपास ही नहीं देश-विदेश से लोगभीपहुंचतेहैं.